नक़्शे पर देश तुम्हारा होता है, झंडा भी तुम्हारा लहराता है, लेकिन ज़मीन के नीचे क्या निकलेगा और उसका मालिक कौन होगा—यह कोई और तय करता है। जैसे ही किसी देश में तेल मिलता है, अचानक वहां लोकतंत्र, मानवाधिकार और सुरक्षा को लेकर चिंता पैदा हो जाती है।
कमज़ोर देशों के लिए नियम अलग हैं। उनके संसाधन “वैश्विक हित” बन जाते हैं और उनकी संप्रभुता “शर्तों” के साथ चलती है। जिनके पास ताक़त है, उनके गलत फ़ैसले भी रणनीति कहलाते हैं। और जिनके पास सिर्फ तेल है, उन्हें सुधार, प्रतिबंध और हस्तक्षेप का पाठ पढ़ाया जाता है।
यह व्यंग्य कड़वा है, लेकिन सवाल सच पूछता है—
क्या आज की दुनिया में बिना ताक़त के आज़ादी संभव है,
या फिर ताक़त ही नैतिकता का प्रमाण बन चुकी है?
डिस्क्लेमर: यह पोस्ट व्यंग्यात्मक और सामान्य राजनीतिक टिप्पणियों पर आधारित है। इसका उद्देश्य किसी देश, संस्था या व्यक्ति के विरुद्ध घृणा फैलाना नहीं, बल्कि वैश्विक राजनीति की प्रवृत्तियों पर विचार प्रस्तुत करना है।