1 d - Translate

यह वीडियो देखकर कोई भी आम नागरिक सवाल पूछेगा। JNU जैसे प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय में अगर कुछ छात्र कैमरे के सामने खुलेआम “मोदी-शाह की कब्र” जैसे नारे लगाते दिख रहे हैं, तो यह केवल नारा नहीं, बल्कि सोच का आइना है। विश्वविद्यालय का काम पढ़ाई, बहस और तर्क सिखाना होता है, न कि नफ़रत और धमकी जैसी भाषा को बढ़ावा देना।
देश के टैक्स के पैसों से चलने वाली संस्थाओं से यह उम्मीद होती है कि वहाँ से जिम्मेदार नागरिक निकलें, न कि समाज को बांटने वाली सोच। असहमति लोकतंत्र का हिस्सा है, सरकार की आलोचना भी अधिकार है, लेकिन भाषा और स्तर भी मायने रखते हैं। जब बात नारेबाज़ी और उकसावे तक पहुँच जाती है, तो सवाल उठना ज़रूरी हो जाता है।
आज आम लोग यही जानना चाहते हैं कि JNU में पढ़ाई का माहौल है या राजनीतिक कट्टरता का। अगर ऐसे नारे सामान्य बना दिए गए, तो आने वाली पीढ़ियों को हम क्या संदेश देंगे?
डिस्क्लेमर:
यह पोस्ट सार्वजनिक रूप से उपलब्ध वीडियो में दिखे बयानों पर आधारित व्यक्तिगत राय है। इसका उद्देश्य किसी भी प्रकार की हिंसा, धमकी या नफ़रत का समर्थन करना नहीं है।

image