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"इस्लाम को स्वीडन के धार्मिक ढांचे में बदलना होगा" - एक बयान, और गहरी बहस
स्वीडन की राजनीति में एक बार फिर से छूट गई है। देश के उप-प्रधान मंत्री एब्बा बुश के बयान में राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा की गई है, जिसमें उन्होंने सार्वजनिक रूप से बुर्का और नकाब पर प्रतिबंध का समर्थन किया है। सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे सार्क के अनुसार, बुश का तर्क है कि स्वीडिश समाज में रहने वाले लोगों को स्थानीय विचारधारा और धार्मिक शैली के लोगों को खुद को ढीलाना चाहिए, न कि किसी अन्य देश के सामाजिक साख को ज्यों-का-त्यों अपनाना चाहिए।
इस प्रस्ताव में कहा गया है कि यह कदम एकीकरण (एकीकरण), लैंगिक समानता और साझा नागरिक स्थिरता को मजबूत करना है। उनके अनुसार, सार्वजनिक स्थानों पर चेहरे को रोकने से सामाजिक संवाद बेहतर होगा और समाज में उपनिवेशों का समावेश होगा।
वहीं आलोचक इस पहल पर धार्मिक स्वतंत्रता पर सीधा हमला मानते हैं। उनका कहना है कि ऐसा प्रतिबंध खास तौर पर मुस्लिम महिलाओं पर प्रतिबंध लगाता है और समाज में दूरी कम करने के बजाय और गहरा कर सकता है। मान्यता प्राप्त विद्वानों ने भी जोखिम भरा हथियार उठाया है, जिससे अल्पसंख्यक समुदायों में सुरक्षा की भावना बढ़ सकती है।
यह बहस केवल प्रारूप तक सीमित नहीं है - यह धर्म, पहचान, कानून और लोकतांत्रिक लोकतंत्र के बीच संतुलन का प्रश्न बन गया है। स्वीडन जैसे बहुसांस्कृतिक समाज में यह बस्ती आने वाले समय में नीति, राजनीति और सामाजिक संबंधों को किस दिशा में ले जाएगी, यह देखना दिलचस्प होगा।
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