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मुफ्ती शमाइल नदवी के बयान पर बहस: संविधान, आस्था और क़ानून का टकराव

मुफ्ती शमाइल नदवी से जुड़े बयानों ने तीखी प्रतिक्रियाएँ पैदा कर दी हैं। आलोचकों का कहना है कि इन टिप्पणियों से राष्ट्रभाव और क़ानून के प्रति एक चयनात्मक दृष्टिकोण झलकता है—जहाँ संविधान के प्रति निष्ठा सुविधानुसार स्वीकार की जाती है, लेकिन धार्मिक क़ानून को उससे ऊपर रखे जाने पर उसे किनारे कर दिया जाता है। कई पर्यवेक्षकों के अनुसार, यही विरोधाभास एक चिंताजनक दोहरे मानदंड की ओर इशारा करता है।

सामाजिक कार्यकर्ता नवजोत शर्मा ने इस मुद्दे को और आगे बढ़ाते हुए चेतावनी दी कि यदि कोई भारत में खुले तौर पर संविधान की सर्वोच्चता को चुनौती देता है, तो इससे समान न्याय की नींव हिलती है। उनका तर्क है कि ऐसी चुनौतियाँ उन संस्थाओं में भरोसे को कमजोर कर सकती हैं, जिनका उद्देश्य धर्म या आस्था से परे हर नागरिक की रक्षा करना है। एक उकसाने वाले प्रतिवाद में उन्होंने कहा कि यदि संवैधानिक सर्वोच्चता पर सवाल उठाए जाते हैं, तो हिंदू भी अपने धार्मिक ग्रंथ—जैसे गीता—को मार्गदर्शक क़ानून के रूप में आगे रखने की बात करने लगेंगे।

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