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🎖️ गलत मंच पर पड़ती रोशनी? अब आत्ममंथन का समय है… 🇮🇳

जब पुरस्कार समारोह प्रायोजकों की चमक में नहाए होते हैं और कैमरे रेड कार्पेट पर पोज़ देते सेलिब्रिटी बच्चों को इतिहास रचता हुआ दिखाते हैं, उसी शोर से बहुत दूर भारत के अखाड़ों, दौड़ के ट्रैकों और स्टेडियमों से एक शांत लेकिन ताक़तवर ख़ामोशी उठती है। यह ख़ामोशी हमारे असली चैंपियनों की है — हमारे ओलंपिक नायकों की।

ये खिलाड़ी डिज़ाइनर सूट पहनकर या पीआर टीम के घेरे में नहीं आते। वे मैदान में उतरते हैं चोटों से भरे शरीर, अडिग हौसले और बलिदान से गढ़े मन के साथ। उनकी चमक फ्लैश कैमरों से नहीं, बल्कि पसीने और ज़ख़्मों से आती है।

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