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जब उनके जीवन में अंधेरा छा गया, तब भी राजनी गोपालकृष्णा के सपने जीवित रहे।

महज़ नौ साल की उम्र में एक एलर्जी के कारण उन्होंने अपनी दृष्टि खो दी, और बीस की उम्र तक आते-आते वे पूरी तरह दृष्टिहीन हो गईं। लेकिन हालात के आगे झुकने के बजाय उन्होंने अपना उद्देश्य चुना—ऐसे समय में चार्टर्ड अकाउंटेंसी की पढ़ाई करना, जब दृष्टिबाधित छात्रों के लिए लगभग कोई भी सुलभ साधन मौजूद नहीं थे। न स्क्रीन रीडर थे, न ऑडियोबुक—सिर्फ स्कैन किए हुए पन्ने, स्वयंसेवी लेखक (स्क्राइब) और अडिग हौसला।

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