स्वर्णनगरी लंका अपने वैभव के चरम पर थी, जहाँ की दीवारें सोने की और खंभे मणियों के थे। उसी चमक-दमक के बीच महारानी मंदोदरी निवास करती थीं। वे केवल एक सुंदरी नहीं थीं; उन्हें शक्ति का नहीं, अपितु प्रज्ञा और विवेक का वरदान प्राप्त था। एक उच्च कुल में जन्मी और संयम व करुणा के संस्कारों में पली-बढ़ी मंदोदरी का विवाह उस महाप्रतापी दशानन से हुआ था, जिसका तेज सूर्य के समान था, परंतु जो भीतर ही भीतर अपने अहंकार की अग्नि में जल रहा था। वह लंका की रानी अपनी इच्छा से नहीं, अपितु भाग्य के खेल से बनी थीं।