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गोरखपुर के एक स्कूल में उस दिन कोई शोर नहीं था,
लेकिन एक पिता की सिसकियों ने पूरे सिस्टम को कटघरे में खड़ा कर दिया।
सुबह जब वह आदमी अपनी छोटी-सी बेटी का हाथ थामे स्कूल पहुँचा,
तो उसके चेहरे पर गुस्सा नहीं था,
आँखों में कोई धमकी नहीं थी—
बस डर, बेबसी और टूटे हुए इंसान की थकी हुई उम्मीद थी।
बेटी ने कई दिनों से कहा था—
“पापा, मुझे स्कूल मत भेजो… टीचर मारती हैं…”
लेकिन पिता ने सोचा—
शायद बच्चा है, बहाना बना रही होगी।
क्योंकि उसे भरोसा था—
स्कूल मंदिर होते हैं, वहाँ डर नहीं सिखाया जाता।
आज वह खुद क्लास में गया।
जैसे ही बच्ची ने अपनी टीचर को देखा,
उसका छोटा-सा शरीर काँप गया…
वह तुरंत पिता के सीने से चिपक गई,
मानो वही उसकी दुनिया का आख़िरी सुरक्षित कोना हो।
और फिर…
जो हुआ, उसने देखने वालों की आँखें नम कर दीं।
वह पिता—
जिसने अपनी बेटी को माँ के बिना पाला,
जिसने अपने आँसू कभी दिखाए नहीं—
आज सबके सामने हाथ जोड़कर रो पड़ा।
काँपती आवाज़ में बस इतना बोला—
“मैडम… अब इसे मत मारना…
मैंने इसे बिना माँ के पाला है…”
न कोई आरोप,
न कोई झगड़ा,
न कोई ऊँची आवाज़।
बस एक टूटे हुए पिता की विनती—
जो अपनी बेटी को पढ़ा तो सकता है,
लेकिन उसके डर को अकेले नहीं झेल सकता।
बच्ची डर के मारे पिता से और ज़ोर से लिपट गई,
जैसे कह रही हो—
“पापा, मुझे छोड़कर मत जाना…”
🌸 यह कहानी सिर्फ एक बच्ची की नहीं है
यह उन हज़ारों बच्चों की कहानी है
जो पढ़ना चाहते हैं,
लेकिन डर के साए में नहीं।
यह उन शिक्षकों से एक मौन सवाल है—
अनुशासन और डर में फर्क समझिए।
डाँट से सुधार हो सकता है,
डर से नहीं।
और यह समाज से एक अपील है—
अगर कोई बच्चा स्कूल से डरता है,
तो उसे ज़िद्दी मत कहिए…
पहले उसकी आँखों में झाँकिए।
क्योंकि
बच्चों की यादें किताबों से नहीं,
व्यवहार से बनती हैं।
और जिस दिन स्कूल डर की जगह बन जाए—
उस दिन शिक्षा हार जाती है।
🙏 हर उस पिता के सम्मान में,
जो बेटी के लिए भगवान से नहीं,
इंसानों से हाथ जोड़कर गुहार लगाता है।
🙏 हर उस बच्ची के लिए,
जो पढ़ना चाहती है—
डरना नहीं।

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