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उत्तराखंड के रहने वाले देवकीनंदन शर्मा (मिलखानी) की कहानी किसी चमत्कार से कम नहीं है।
महज 18 साल की उम्र में करंट की चपेट में आकर उन्होंने अपने दोनों हाथ खो दिए।
एक झटके में ज़िंदगी बदल गई… सपने, पढ़ाई, भविष्य—सब कुछ अधूरा सा लगने लगा।

हादसे के बाद हालात ऐसे बने कि उन्हें पशु चराने का काम करना पड़ा।
लेकिन देवकीनंदन ने हालात के आगे कभी हार नहीं मानी।

जब हाथ साथ नहीं थे, तब उन्होंने पैरों की उंगलियों से मिट्टी में लिखना सीखना शुरू किया।
जंगल में, पेड़ों की टहनियों से, घंटों अभ्यास करते रहे।
धीरे-धीरे पैरों से लिखने में महारत हासिल कर ली।
इसके बाद कागज और पेन से लिखना सीखा—और सिर्फ एक साल में पूरी तरह निपुण हो गए।

वे बचपन से ही एक प्रतिभाशाली छात्र थे और बड़ा अधिकारी बनना चाहते थे।
हादसे के बाद भी यह सपना नहीं छोड़ा।
उन्होंने अपने भाई को पहला लेटर पैरों से लिखकर भेजा, जिसमें साफ लिखा था—
👉 “मुझे फिर से पढ़ाई शुरू करनी है।”

देवकीनंदन ने 1986 में एसएससी की पढ़ाई पूरी की।
उसी दौरान भगवान महावीर विकलांग सहायता समिति का कैंप उत्तराखंड के रानीखेत में लगा।
वे वहां पहुंचे, लेकिन कंधे से हाथ कटे होने की वजह से चयन नहीं हुआ।

उन्होंने संस्था के फाउंडर से कहा—
👉 “मैं किसी पर निर्भर नहीं रहना चाहता। मैं अपने पैरों से लिख सकता हूं।”

जब उन्होंने सबके सामने पैरों से लिखकर दिखाया, तो लोग हैरान रह गए।
लोगों ने पैसे देने चाहे, लेकिन देवकीनंदन ने कहा—
👉 “मुझे पैसे नहीं, नौकरी चाहिए।”

इसके बाद वे कोटा आए।
1986 में छोटे काम से शुरुआत हुई।
स्टोर कीपिंग और अकाउंटिंग सीखी।
1987 में क्लर्क,
1990 में सुपरवाइजर,
और आज वे भगवान महावीर विकलांग सहायता समिति में मैनेजर के पद पर कार्यरत हैं।

देवकीनंदन आज भी
✔️ पैरों से पेन पकड़कर लिखते हैं
✔️ पैरों से कंप्यूटर चलाते हैं
✔️ फाइलें लगाते-निकालते हैं
✔️ स्टेपलर से कागज जोड़ते हैं
✔️ यहां तक कि अपने कपड़े भी खुद धोते हैं

वे कहते हैं—“38 साल हो गए, ऑफिस का सारा काम खुद करता हूं।
और जिनके हाथ या पैर नहीं हैं, उन्हें मैं विकलांग नहीं मानता।”

मंज़िल उन्हें ही मिलती है जिनके सपनों में जान होती है,
पंख से कुछ नहीं होता…
हौसलों से उड़ान होती है।

देवकीनंदन मिलखानी सिर्फ एक इंसान नहीं,
बल्कि हिम्मत, आत्मनिर्भरता और जज़्बे की जीती-जागती मिसाल हैं 🙏

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