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लखनऊ के गोसाईंगंज की रहने वाली मीना सोनी की जिंदगी एक रविवार दोपहर हमेशा के लिए बदल गई। 30 जून 2004 को यूपी के बांदा स्थित ससुराल में मीना दोपहर का काम निपटाकर अपने कमरे में आराम कर रही थीं। तभी उनके पति ने सोते समय उनके चेहरे पर तेजाब डाल दिया। तेजाब से उनका चेहरा, आंखें, होंठ और नाक बुरी तरह झुलस गए। ब्लाउज और साड़ी जल गईं। जान बचाने के लिए मीना कपड़े फेंककर सिर्फ पेटीकोट में सड़क पर भागीं। 9 साल की बेटी भी उनके साथ थी, लेकिन लोग तमाशबीन बने रहे, किसी ने मदद नहीं की।
मीना एक प्राइवेट अस्पताल पहुंचीं, जहां उन्हें भर्ती करने से मना कर दिया गया। शरीर ढकने के लिए गमछा मांगने पर भी एक आदमी ने डर के कारण इनकार कर दिया। आखिरकार जिला अस्पताल में उन्हें भर्ती किया गया। तीन दिन बाद उन्हें इलाहाबाद रेफर किया गया, जहां पता चला कि उनके पति ने भी वही तेजाब पीकर आत्म/हत्या की कोशिश की थी। कुछ दिन बाद उसी अस्पताल में पति की मौत हो गई। ससुराल वालों ने न इलाज में मदद की और न ही सहारा दिया।
इलाज के बाद मीना को यह भी एहसास हुआ कि उनका चेहरा हमेशा के लिए बिगड़ चुका है। बच्चों को देखकर डर लगना, खुद का चेहरा शीशे में देखना—यह सब उनके लिए मानसिक यातना बन गया। ससुराल ने रिश्ता तोड़ लिया, तब मीना मायके लौट आईं और एक एनजीओ से जुड़कर काम शुरू किया।
धीरे-धीरे उन्होंने अपने बच्चों को अपने साथ रखा, तीन सर्जरी करवाईं और खुद को संभाला। आज मीना अपने पैरों पर खड़ी हैं। उनके तीनों बच्चे पोस्ट ग्रेजुएट हैं और एक बेटी मॉडलिंग कर रही है। मीना कहती हैं—“चेहरा भले जल गया, लेकिन आज जिंदगी सुकून में है।”

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