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आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू के हालिया फैसलों ने देशभर में व्यापक चर्चा और बहस को जन्म दे दिया है। तिरुपति बालाजी मंदिर से जुड़े अहम ऐलानों में उन्होंने स्पष्ट किया कि मंदिर से जुड़े सभी कार्यों में केवल हिंदू कर्मचारियों की ही नियुक्ति की जाएगी, जबकि गैर-हिंदू कर्मचारियों को अन्य विभागों या स्थानों पर स्थानांतरित किया जाएगा। उनके अनुसार, यह निर्णय मंदिर की धार्मिक मर्यादा और परंपराओं की रक्षा के उद्देश्य से लिया गया है।
इसके साथ ही चंद्रबाबू नायडू ने तिरुपति में प्रस्तावित मुमताज़ होटल प्रोजेक्ट के लिए किए गए भूमि आवंटन को भी रद्द कर दिया। उन्होंने कहा कि तिरुपति केवल एक पर्यटन स्थल नहीं, बल्कि करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है, और इसकी आध्यात्मिक पहचान से किसी भी प्रकार का समझौता नहीं किया जा सकता। सरकार का मानना है कि ऐसे व्यावसायिक प्रोजेक्ट मंदिर नगरी की पवित्रता पर असर डाल सकते हैं।
इतना ही नहीं, नायडू ने एक और बड़ा प्रस्ताव रखते हुए कहा कि भारत के हर राज्य की राजधानी में भगवान वेंकटेश्वर स्वामी का मंदिर बनाया जाना चाहिए, ताकि देशभर में सनातन संस्कृति और आस्था को और मजबूत किया जा सके। उनके इस विचार को कुछ लोग सांस्कृतिक एकता का प्रतीक बता रहे हैं, जबकि कुछ वर्ग इसे राजनीति से जोड़कर देख रहे हैं।
इन फैसलों और प्रस्तावों ने सोशल मीडिया से लेकर राजनीतिक गलियारों तक बहस तेज कर दी है। समर्थकों का कहना है कि यह कदम धार्मिक स्थलों की गरिमा और परंपराओं की रक्षा के लिए ज़रूरी हैं, वहीं आलोचक इसे संवैधानिक और सामाजिक दृष्टि से सवालों के घेरे में रख रहे हैं। साफ है कि चंद्रबाबू नायडू के ये ऐलान आने वाले दिनों में राष्ट्रीय स्तर पर बड़े विमर्श का विषय बने रहेंगे।

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