सिर्फ 0.01% लोग ही पूरी कर पाते हैं आयरनमैन चुनौती, उत्तराखंड के ब्रिगेडियर मोहित ममगाईं ने रच दिया इतिहास
कहते हैं कि हौसला, अनुशासन और जज़्बा अगर एक साथ मिल जाए, तो इंसान असंभव को भी संभव बना देता है। देवभूमि उत्तराखंड के ब्रिगेडियर मोहित ममगाईं ने यही कर दिखाया है। दुनिया की सबसे कठिन और क्रूर खेल प्रतियोगिताओं में गिनी जाने वाली आयरनमैन ट्रायथलॉन को सफलतापूर्वक पूरा कर उन्होंने न सिर्फ भारतीय सेना, बल्कि पूरे देश का नाम रोशन किया है।
आयरनमैन कोई साधारण प्रतियोगिता नहीं है। यह इंसान की शारीरिक और मानसिक सहनशक्ति की अंतिम परीक्षा मानी जाती है। इसमें प्रतिभागी को एक ही दिन में
3.8 किलोमीटर तैराकी,
180 किलोमीटर साइक्लिंग
और इसके बाद 42.2 किलोमीटर की फुल मैराथन दौड़ पूरी करनी होती है।
कुल मिलाकर 226 किलोमीटर की यह चुनौती इतनी कठिन होती है कि दुनिया में इसे शुरू करने वालों में से भी बहुत कम लोग फिनिश लाइन तक पहुंच पाते हैं। आंकड़ों के मुताबिक, सिर्फ 0.01% लोग ही इस चुनौती को पूरा कर पाते हैं।
ब्रिगेडियर मोहित ममगाईं ने इस असंभव मानी जाने वाली चुनौती को न केवल स्वीकार किया, बल्कि दृढ़ संकल्प और सैन्य अनुशासन के दम पर इसे पूरा कर दिखाया। रेस के दौरान घंटों तक लगातार चलते रहने के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी। शरीर थक चुका था, मांसपेशियां जवाब देने लगी थीं, लेकिन मन और इरादे अडिग रहे।
इस पूरी प्रतियोगिता के दौरान मोहित ममगाईं ने यह साबित किया कि भारतीय सेना का जज़्बा सिर्फ युद्धभूमि तक सीमित नहीं है, बल्कि हर उस मोर्चे पर दिखाई देता है जहां साहस और धैर्य की जरूरत होती है। फिनिश लाइन पर तिरंगा थामे उनका मुस्कुराता चेहरा लाखों युवाओं के लिए प्रेरणा बन गया।
उनकी यह उपलब्धि सिर्फ एक व्यक्तिगत जीत नहीं है, बल्कि यह संदेश है कि उम्र, पद या जिम्मेदारियां कभी भी सपनों के आड़े नहीं आ सकतीं। सही सोच, नियमित अभ्यास और मजबूत इच्छाशक्ति से हर लक्ष्य हासिल किया जा सकता है।
उत्तराखंड की धरती पहले भी वीरों, सैनिकों और साहसी व्यक्तित्वों के लिए जानी जाती रही है। ब्रिगेडियर मोहित ममगाईं ने एक बार फिर साबित कर दिया कि देवभूमि की रगों में साहस और अनुशासन बहता है।
आज ब्रिगेडियर मोहित ममगाईं सिर्फ एक आयरनमैन फिनिशर नहीं हैं, बल्कि उन तमाम लोगों के लिए उम्मीद की मिसाल हैं जो यह मान लेते हैं कि कुछ चीजें उनके बस की नहीं।
उनकी कहानी कहती है — अगर इरादे मजबूत हों, तो सबसे कठिन रास्ता भी पार किया जा सकता है।
देवभूमि को गर्व है अपने इस सपूत पर
जय हिंद।