9 часы - перевести

भारतीय रेल के सामान्य डिब्बे से एक बार फिर जिंदगी की वह तस्वीर सामने आई है, जिसे अक्सर व्यवस्था अनदेखा कर देती है। ट्रेन में इतनी भीड़ है कि पैर रखने तक की जगह नहीं। हर चेहरा थकान, मजबूरी और चुप्पी की कहानी कह रहा है।
इसी भीड़ में एक युवक अपनी पत्नी और छोटे बच्चों के साथ टॉयलेट के बाहर ज़मीन पर बैठा दिखाई देता है। कभी वह पत्नी को सहारा देता है, तो कभी बच्चों को गोद में सुलाने की कोशिश करता है। डिब्बे में न तो बैठने की जगह है, न ही आराम की कोई उम्मीद।
उस युवक के चेहरे पर न गुस्सा है, न विरोध—क्योंकि उसे मालूम है कि वह स्लीपर या एसी टिकट खरीदने की स्थिति में नहीं है। मजबूरी ने उसे सिखा दिया है कि यह सफर ऐसे ही काटना होगा।
डिब्बे के अंदर कुछ यात्री सीट पर बैठकर खाना खा रहे हैं। वहीं ज़मीन पर बैठे बच्चों की मासूम आंखें उन्हें देख रही हैं—शायद वे यह समझने की कोशिश कर रही हों कि बैठने का अधिकार आखिर किन लोगों के लिए बना है। हैरानी की बात यह है कि किसी ने भी बच्चों को अपनी सीट देने की ज़रूरत महसूस नहीं की।
सवाल यह नहीं है कि नियम क्या कहते हैं, सवाल यह है कि क्या हमारी व्यवस्था और हमारा समाज कभी इन यात्रियों को सम्मानपूर्वक सफर दे पाएगा?
जनरल डिब्बे का किराया चुकाने के बाद भी अगर एक इंसान को बैठने तक की जगह न मिले, तो यह सिर्फ़ भीड़ की समस्या नहीं, बल्कि संवेदनशीलता और सिस्टम—दोनों की विफलता है।
यह दृश्य किसी एक ट्रेन का नहीं है। यह उन लाखों भारतीयों की कहानी है, जो रोज़ अपनी मजबूरी को टिकट बनाकर सफर करते हैं—खामोशी से, बिना शिकायत के।

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