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"सौंदर्य की नहीं, स्वाभिमान की देवी थीं रानी पद्मिनी।
1303 ई. में जब अलाउद्दीन खिलजी की काली छाया चित्तौड़ पर पड़ी, तो उन्होंने झुकने के बजाय 'जौहर' की पवित्र अग्नि को चुना। 16,000 वीरांगनाओं के साथ वो आग में समा गईं, लेकिन अपना और अपने कुल का मान मैला नहीं होने दिया।

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