श्री परमहंस योगानंद जी ने अपनी शिक्षाओं के प्रसार के लिए योगदा सत्संग सोसाइटी ऑफ़ इंडिया / सेल्फ रिलाइजेशन फैलोशिप की स्थापना की ।
अपने लेखों और भारत अमेरिका तथा यूरोप के सघन दौरों में अपने व्याखानों के द्वारा अनेक आश्रम और ध्यान केंद्र बनाकर उनके माध्यम से हजारों सत्यान्वेशियों को योग के प्राचीन विज्ञान एवं दर्शन से और उनकी सर्वानुकूल ध्यान पद्धतियों से परिचित कराया।
वही परमहंस योगानंद जी अगस्त 1935 में गांधीजी से मिलने जब उनके आश्रम में पहुंचे तो उस बारे में उन्होंने अपनी आत्मकथा में लिखा है __________
अतिथि भवन में प्रवेश करते हुए मैं यहां हर तरफ दिखाई देने वाली नितांत सादगी और त्याग की निशानियों को देखकर फिर एक बार प्रभावित हो उठा।
गांधी जी ने अपने वैवाहिक जीवन के काफी प्रारंभ में ही अपरिग्रह व्रत ले लिया था वार्षिक ₹60000 से अधिक आय देने वाली वकालत छोड़कर उन्होंने अपनी सारी संपत्ति गरीबों में बांट दी थी।
मुझे श्री युक्तेश्वर जी का व्यंग्य याद आया कि भिखारी संपत्ति का त्याग नहीं कर सकता यदि कोई मनुष्य विलाप करता है कि मेरा धंधा डूब गया पत्नी मुझे छोड़ कर चली गई अब मैं संसार त्याग कर आश्रम चला जाता हूं तो किस संसार त्याग की वह बात कर रहा है?
उसने किसी संपत्ति और प्रेम का त्याग नहीं किया संपत्ति और प्रेम ने उसका त्याग कर दिया है।
दूसरी ओर गांधी जी जैसे संतों ने केवल भौतिक संपत्तियों का ही प्रत्यक्ष त्याग नहीं किया बल्कि उससे भी कठिन निजी लक्ष्य प्राप्ति और स्वार्थी उद्देश्यों का त्याग कर दिया और अपने अस्तित्व के गहनतम हिस्सों को भी सारी मानव जाति को एक ही धारा मानकर उसमें विलीन कर दिया।
महात्मा जी की असाधारण धर्मपत्नी कस्तूरबा ने कोई आपत्ति प्रकट नहीं की की उन्होंने उनके लिए या उनके बच्चों के लिए कुछ बचा कर नहीं रखा।

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