गाँव के बाहर फैले खेतों के बीच एक पुराना, टूटा-फूटा चौराहा था। कभी वहाँ यात्रियों की चहल-पहल रहती थी, पर अब समय की मार से वह बस एक पत्थर का ढेर बनकर रह गया था। उसी चौराहे पर आज एक अद्भुत दृश्य दिखाई दे रहा था।
लाल सिंदूर से लिप्त, वानर-मुख वाले हनुमान जी वहाँ शांति से सोए हुए थे। उनका विशाल शरीर चौराहे पर विश्राम कर रहा था, गदा पास ही रखी थी। आसपास फूलों की पंखुड़ियाँ और कुमकुम बिखरा हुआ था, मानो किसी अनदेखे भक्त ने रात में पूजा की हो।
दूर खेतों में किसान अपने बैलों के साथ हल चला रहे थे। मिट्टी की खुशबू और बैलों की घंटियों की आवाज़ वातावरण को पवित्र कर रही थी। किसान जानते थे—
“जब तक बजरंगबली यहाँ विश्राम कर रहे हैं, हमारे खेत सुरक्षित हैं।”
कहते हैं, एक बार इस गाँव में सूखा पड़ गया था। फसलें नष्ट होने लगीं, भय छा गया। उसी रात गाँव के बुज़ुर्ग ने स्वप्न में देखा कि हनुमान जी खेतों के चौराहे पर आकर सो गए हैं, ताकि भूमि की रक्षा कर सकें।
अगली सुबह बारिश हुई। धरती फिर से हरी हो उठी। तब से लोग मानने लगे कि हनुमान जी केवल युद्ध के देवता नहीं, बल्कि किसानों, खेतों और श्रम की रक्षा करने वाले देवता भी हैं।
आज भी जब कोई किसान उस चौराहे के पास से गुजरता है, तो सिर झुकाकर कहता है—
“सोते रहो बजरंगबली, जब तक आप यहाँ हैं, हमारा गाँव सुरक्षित है।”
और सच ही तो है—
जहाँ हनुमान जी का विश्राम होता है, वहाँ भय, अकाल और संकट स्वयं ही विश्राम कर लेते हैं।
(यह एक काल्पनिक प्रेरणादायक कहानी है)