भारतीय समाज में मंदिरों की रक्षा और सवर्ण हितों की लड़ाई लड़ने वाली एक अनोखी पिता-पुत्र जोड़ी ने देशव्यापी पहचान बना ली है। ये वो सपूत हैं जो हिंदू धरोहर को बचाने और आरक्षण-जातिवाद के खिलाफ खुलकर उतरते हैं। चाहे अयोध्या राम मंदिर विवाद हो या हरिद्वार-काशी के मंदिरों पर कब्जे की धमकी, यह जोड़ी हमेशा सबसे आगे रहती है।
संघर्ष की शुरुआत: पिता का अडिग संकल्प
पिता ने अपने जीवन का बड़ा हिस्सा सामाजिक न्याय के नाम पर हो रही सवर्ण उत्पीड़न के खिलाफ समर्पित किया। 1990 के दशक से वे मंदिरों पर अवैध कब्जों के खिलाफ आंदोलन चला रहे हैं। दिल्ली के चित्रकूट मंदिर से लेकर तमिलनाडु के सबरीमाला तक, हर जगह उनकी आवाज गूंजी। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में कई PIL दाखिल कीं, जिनमें मंदिरों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त करने की मांग की। सवर्ण आरक्षण के खिलाफ उनकी सबसे तीखी आलोचना रही—'यह सवर्णों का अपमान है, योग्यता पर चोट।' उनके भाषणों ने लाखों युवाओं को जागृत किया।