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उस लड़की ने बस इतना कहा — “ठाकुर हूँ मैं.. मुझसे बकचोदी मत करना साले।"
और देश का पूरा इकोसिस्टम अलर्ट मोड में आ गया ! टाइमलाइन गरम हुई, नैतिकता जाग उठी, सोशल मीडिया में भारी आक्रोश मच गया। अरे ये लड़की तो जातिवाद कर रही है। ऊँची जाति होने का घमण्ड दिखा रही है। ब्ला ब्ला।
पर ज़रा ठहरो ! एक बात हमारी भी सुनो फिर फैसला करना।
हम उसी देश में रहते हैं, जहाँ जाति प्रमाणपत्र सरकार खुद जारी करती है। फॉर्म से लेकर शादी के विज्ञापनों तक, हर जगह जाति लिखी जाती है। सरकारी योजनाएँ, करियर के मौके, राजनीति, सब में जाति खुलकर इस्तेमाल होती है। वोट भी जाति के नाम पर माँगे जाते हैं।
एडमिशन में जाति, नौकरी में जाति ,राजनीति में जाति, शादी में जाति वो सब आपके लिए ठीक हैं।
पर फिर उस लड़की का “ ठाकुर हूँ मैं” बोलना अपराध कैसे? ये कोरा दोगलापन है आपका।
इस लड़की ने ठाकुर होने का मुचलका भरा है। कीमत चुकाई है। उसको बचपन से आपने बताया है कि वो ठाकुर हूँ। और उससे ठाकुर होने की कीमत समय समय पर वसूलता रहेगा ये सिस्टम।
इसके दलित दोस्तों ने कभी एग्जाम फ़ीस नहीं दी होगी.. क्योंकि इस ठाकुर लड़की से इस सिस्टम ने चार गुना फीस वसूली थी। बेशक़ सब ही गरीब और संघर्षरत रहे होंगे.. इस ठाकुर लड़की को सवर्ण होने के कारण अधिक मेरिट पर भी रेस से बाहर होना पड़ा होगा।
इस लड़की को तुमने समय समय पर एहसास करवाया है कि वो ठाकुर है। अब अगर वो प्राउडली कह रही है कि मैं ठाकुर हूँ.. तो तुमको मिर्च क्यों लग रही है दोस्त।
दोगलेपन को बेनकाब करना मेरा शौक है।

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