"किरदार कोई भी हो, कलाकार उसे जी ही लेता है—चाहे वो मंच की चकाचौंध हो या तिहाड़ जेल की काल कोठरी!"
राजपाल यादव के लिए बीता गुरुवार उम्मीदों और मायूसी का मिला-जुला दिन रहा। जहाँ करोड़ों फैन्स उनके बाहर आने की दुआ कर रहे थे, वहीं कानून की चौखट पर उन्हें एक बार फिर राहत नहीं मिली। दिल्ली हाई कोर्ट ने साफ़ कर दिया कि अब राजपाल भाई को आने वाले सोमवार तक सलाखों के पीछे ही रहना होगा।
अदालत की दहलीज़ पर इस बार दलीलें नहीं, बल्कि टूटे हुए वादे भारी पड़ गए। जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा का रुख तब बेहद सख्त हो गया जब उन्होंने याद दिलाया कि ये पहली बार नहीं है, बल्कि इससे पहले भी दर्जनों बार भरोसे को तोड़ा गया है। कानून की नज़र में 'शादी' या 'पारिवारिक मजबूरी' से ज़्यादा अहमियत उस वचन की थी जिसे राजपाल समय पर पूरा नहीं कर सके। अब उनके वकील के पास सोमवार तक का ही वक्त है जब उन्हें कागजों पर कोई पुख्ता समाधान पेश करना होगा।
लेकिन सलाखों के पीछे की कहानी कुछ और ही बयां कर रही है। महलों की सुख-सुविधाओं से दूर, जेल नंबर-2 की उन चारदीवारों में राजपाल भाई ने खुद को एक आम कैदी की तरह ढाल लिया है। वहाँ कोई VIP ट्रीटमेंट नहीं है, बस वही नियम हैं जो सबके लिए हैं—चाहे वो सुबह की हाज़िरी हो या साफ़-सफाई। शुरुआती खामोशी के बाद, अब उन्होंने उस अंधेरे में भी मुस्कुराहटें ढूंढ ली हैं। वे अपने साथी कैदियों को हंसा रहे हैं, अपनी फिल्मों के किस्से सुना रहे हैं और उनके बीच एक 'सितारा' बनकर नहीं, बल्कि एक 'साथी' बनकर रह रहे हैं। वे आज भी यही कहते हैं कि उनकी नीयत कभी बेईमानी की नहीं थी, बस वक्त के थपेड़ों ने उन्हें यहाँ ला खड़ा किया है।