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इतिहास अक्सर चेतावनी देता है, और महाभारत की ये पंक्तियाँ उसी चेतावनी का प्रतीक हैं।
“दो न्याय अगर तो आधा दो…”
यह केवल भूमि की मांग नहीं थी, बल्कि सम्मान और न्याय की अंतिम अपील थी। जब संवाद, समझौता और संतुलन की हर संभावना ठुकरा दी जाती है, तब टकराव अनिवार्य हो जाता है।
दुर्योधन ने पाँच ग्राम भी नहीं दिए। परिणाम क्या हुआ, यह इतिहास जानता है। जो सत्ता अहंकार में न्याय को ठुकराती है, वह अंततः समाज का आशीर्वाद भी खो देती है।

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