4 uur - Vertalen

अजीब तमाशा है भाई इस दुनिया का अगर एक गरीब का बच्चा पेट की आग बुझाने के लिए चाय की दुकान पर बर्तन मांझे तो उसे 'बाल अपराध' कह कर पुलिस उठा ले जाती है लेकिन वही बच्चा अगर टीवी सीरियल के सेट पर रात-रात भर मेकअप लगाकर 18-18 घंटे कैमरे के सामने खटे तो उसे दुनिया 'बाल कलाकार' कह कर तालियां बजाती है मतलब ये कौन सा चश्मा है भाई जिससे गरीब और अमीर का बचपन अलग-अलग नजर आता है राज्यसभा सांसद स्वाति मालीवाल जी ने जो सवाल उठाया है ना वो सीधा सिस्टम के मुंह पर तमाचा है सोचिए एक मासूम अगर मजबूरी में अपने परिवार की दो वक्त की रोटी के लिए पसीना बहाए तो उसे 'जुर्म' बता दिया जाता है मालिक पर केस होता है बच्चे को रेस्क्यू किया जाता है लेकिन वही मासूमियत जब बड़े-बड़े प्रोड्यूसर्स के लिए करोड़ों का धंधा करती है जब वो बच्चा अपनी पढ़ाई छोड़कर स्टूडियो की लाइटों में झुलसता है तब कानून को उसमें कोई बुराई नजर नहीं आती क्यों क्योंकि वहां पैसा है वहां ग्लैमर है वहां से सरकार को टैक्स मिल रहा है क्या अब बचपन की कीमत भी बैंक बैलेंस से तय होगी क्या कानून सिर्फ उस पर चलेगा जिसकी जेब खाली है अगर बच्चे का काम करना गलत है तो वो हर जगह गलत होना चाहिए चाहे वो ढाबे की कालिख में हो या किसी आलीशान स्टूडियो की चकाचौंध में क्या हम एक ऐसे समाज में जी रहे हैं जहां गरीबी ही सबसे बड़ा गुनाह बन गई है और अमीरी हर गलती को हुनर बना देती है आखिर ये दोहरा मापदंड कब तक चलेगा कब तक हम मासूमों के बचपन को पैसों की तराजू में तोलते रहेंगे दोस्तों क्या आप स्वाति मालीवाल जी की इस बात से सहमत हैं क्या आपको भी लगता है कि हमारे कानून की ये दोहरी सोच गलत है अपनी राय कमेंट में लिखो शर्माओ मत और इस वीडियो को इतना शेयर करो कि ये सवाल हर उस कुर्सी तक पहुँचे जो कानून की अलग-अलग परिभाषा बनाती है बोलो क्या ये सही है या गलत?

image