अम्बेडकरनगर की यह खबर सुनकर दिल दहल जाता है और मन गहरे दुख से भर जाता है। कल्पना कीजिए उन नेत्रहीन माता-पिता के दर्द की, जिनके लिए उनका 9 साल का बेटा अंश ही उनकी दुनिया और उनके बुढ़ापे की इकलौती लाठी था। एक पिता जो ट्रेन में चना बेचकर मेहनत से अपने घर का दीया जला रहा था, आज उस घर में अंधेरा छा गया है।
आरोप है कि स्कूल में घंटों मासूम अंश दर्द से तड़पता रहा, उल्टियां करता रहा, लेकिन किसी का दिल नहीं पसीजा। न घर वालों को खबर दी गई, न ही समय पर इलाज मिला। स्कूल की बस ने उसे घर से दूर सड़क पर उतार दिया और शाम होते-होते उस मासूम ने दम तोड़ दिया। क्या एक स्कूल की जिम्मेदारी सिर्फ शिक्षा देने तक है? क्या बच्चों की जान की कोई कीमत नहीं? जब उस मासूम के शव को कब्र से निकालकर पोस्टमार्टम के लिए ले जाया गया, तो पूरे इलाके की आंखें नम थीं। उन बेबस माता-पिता की चीखें सिस्टम से सवाल पूछ रही हैं कि आखिर उनके बेटे का कसूर क्या था? यह सिर्फ एक बच्चे की मौत नहीं, बल्कि भरोसे और इंसानियत की हार है। भगवान उन माता-पिता को यह असह्य दुख सहने की शक्ति दे और इस मासूम को इंसाफ मिले। 💔
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