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सवर्ण समाज को अपने घर में आग लगाने वाले जयचंदों को ठीक से पहचान लेना है और इनको हर स्तर पर सबक सिखाना है।
जब इंसान की इंसानियत, आत्मसम्मान और जमीर मर जाता है तो जीवन संघर्ष मुक्त हो जाता है।
ठीक यही परिस्थिति हमारे सवर्ण समाज के सांसदों के साथ हैं।
हमारे होनहार बच्चों का आने वाला कल जलने जा रहा है लेकिन नीति निर्धारण में भागीदार सांसद मूकदर्शक बन कर तमाशा देख रहे हैं।
शर्म आनी चाहिए!
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