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जब तक देश में ऐसी नीतियाँ और ऐसी सरकारें रहेंगी जो आम लोगों की तकलीफ़ को महसूस नहीं करतीं, तब तक सस्ती रहेगी तो सिर्फ मेहनतकश की मेहनत, किसान की फसल और युवाओं की ज़िंदगी।
किसान दिन-रात खेतों में पसीना बहाता है, लेकिन उसकी उपज का सही दाम नहीं मिलता। युवा पढ़-लिखकर भी बेरोज़गारी और असुरक्षा का सामना करते हैं। हमारी माँ-बहनों और बेटियों की सुरक्षा आज भी एक बड़ा सवाल बनी हुई है।
और दूसरी तरफ, बाजार में खाने-पीने की चीज़ों में मिलावट, बढ़ती महंगाई और रोज़मर्रा की ज़रूरतों पर बोझ लगातार बढ़ता जा रहा है। आम जनता की जेब ढीली होती जा रही है, लेकिन ज़िम्मेदारी लेने वाला कोई नज़र नहीं आता।
अब समय है सोचने का…
समय है सवाल पूछने का…

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