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कुंडलिनी शक्ति के प्रमुख पहलू:
• स्थान और स्वरूप: यह सूक्ष्म शरीर में रीढ़ की हड्डी के निचले हिस्से (मूलाधार चक्र) में सुप्तावस्था में रहती है।
• जागृति का उद्देश्य: योग, तंत्र साधना, प्राणायाम और ध्यान के माध्यम से जब यह शक्ति जागृत होती है, तो यह सुषुम्ना नाड़ी के माध्यम से ऊपर उठती है और विभिन्न चक्रों (मूलाधार से आज्ञा चक्र) को सक्रिय करती है।
• परिणाम: इसके जागृत होने पर व्यक्ति को अलौकिक क्षमताएं, ज्ञान, शारीरिक और मानसिक शक्ति में जबरदस्त वृद्धि, और सर्वोच्च चेतना का अनुभव होता है।
• शक्तिशाली और खतरनाक: यह एक अत्यंत शक्तिशाली ऊर्जा है, जिसे यदि बिना योग्य गुरु या उचित तैयारी के जगाया जाए, तो यह मानसिक और शारीरिक संतुलन को नुकसान पहुँचा सकती है।
• प्रकृति: इसे परमपिता का अर्द्धनारीश्वर भाग, पराशक्ति या आदिशक्ति (दुर्गा/काली का रूप) भी माना जाता है।

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