इस बच्ची की आंखों में छिपी झिझक और अपने फटे हुए कपड़ों को समेटने की यह कोशिश हम सभी के लिए एक आईना है। हम जिस दुनिया में बड़ी बड़ी सुविधाओं की बात करते हैं वहां आज भी कई बचपन बुनियादी जरूरतों और सम्मान के लिए तरस रहे हैं। यह दृश्य बताता है कि स्वाभिमान किसी उम्र या अमीरी का मोहताज नहीं होता।