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बच्चों के व्यवहार पर माता-पिता का गहरा प्रभाव पड़ता है। कई मनोवैज्ञानिक शोध बताते हैं कि बच्चे केवल बातें सुनकर ही नहीं, बल्कि अपने माता-पिता के व्यवहार को देखकर भी बहुत कुछ सीखते हैं। इसे Social Learning Theory कहा जाता है, जिसे प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक Albert Bandura ने समझाया था। इस सिद्धांत के अनुसार बच्चे अपने आसपास के लोगों, खासकर माता-पिता को देखकर उनके व्यवहार की नकल करते हैं।

जब घर में किसी बात पर झगड़ा या बहस होती है, तो बच्चे यह ध्यान से देखते हैं कि उनके पिता उस स्थिति में कैसे प्रतिक्रिया देते हैं। कई अध्ययनों में पाया गया है कि लगभग 60–70% तक बच्चे वही तरीका अपनाने लगते हैं, जो वे अपने पिता को गुस्से या विवाद के समय इस्तेमाल करते हुए देखते हैं। अगर पिता गुस्से में ऊँची आवाज़ में बात करते हैं, दूसरों का अपमान करते हैं, या आक्रामक व्यवहार दिखाते हैं, तो बच्चा इसे एक सामान्य और स्वीकार्य तरीका मान सकता है।

ऐसा इसलिए भी होता है क्योंकि बहुत से परिवारों में पिता को अधिकार और शक्ति के प्रतीक के रूप में देखा जाता है। बच्चे अक्सर सोचते हैं कि पिता जैसा व्यवहार करना ही सही तरीका है। इसलिए वे अनजाने में वही भाषा, वही गुस्सा और वही प्रतिक्रिया अपने दोस्तों, भाई-बहनों या स्कूल के साथियों के साथ इस्तेमाल करने लगते हैं।

हालाँकि इसका मतलब यह नहीं है कि माँ का प्रभाव नहीं होता। माँ भी बच्चों के भावनात्मक विकास और व्यवहार को प्रभावित करती हैं। लेकिन झगड़े या टकराव के तरीके में कई शोधों ने यह पाया है कि बच्चे अक्सर पिता के आक्रामक या असम्मानजनक व्यवहार को अधिक तेजी से कॉपी करते हैं, क्योंकि वे उसे ताकत और नियंत्रण से जोड़कर देखते हैं।
इसी कारण मनोवैज्ञानिक सलाह देते हैं कि जब भी बच्चों के सामने कोई मतभेद या विवाद हो, तो माता-पिता को सम्मानजनक, शांत और समाधान-केंद्रित तरीके से बात करनी चाहिए। जब बच्चे देखते हैं कि बड़े लोग बिना चिल्लाए, बिना अपमान किए समस्या का समाधान कर रहे हैं, तो वे भी वही स्वस्थ तरीका सीखते हैं।

संक्षेप में:

बच्चे झगड़ा करना नहीं सीखते, बल्कि झगड़ा कैसे करना है यह अपने घर के माहौल से सीखते हैं। इसलिए माता-पिता का व्यवहार ही बच्चों के भविष्य के व्यवहार की सबसे बड़ी सीख बन जाता है।

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