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जरा पहचानिए इन्हें..

दिल्ली में तरुण की हत्या के मामले में जमीयत उलेमा-ए-हिंद का एक प्रतिनिधिमंडल पुलिस से मिला।

यह वही संगठन है जो 2006 के वाराणसी बम धमाकों के दोषी आतंकी वलीउल्लाह खान का कोर्ट में बचाव कर चुका है, वाराणसी धमाके में 28 लोगों की मौत हुई थी।

इसी तरह 2010 में पुणे की जर्मन बेकरी में हुए बम धमाके के आरोपी मिर्ज़ा हिमायत बैग का भी इस संगठन ने कोर्ट में बचाव किया था, उस हमले में 17 लोग मारे गए थे।

आतंकियों का कोर्ट में बचाव करने से देश का "सेक्युलरिज़्म" खतरे में नहीं पड़ता,

लेकिन होली पर फेंका गया एक पानी का गुब्बारा जरूर समस्या बन जाता है!

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