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#रामचरितमानस के उत्तरकांड से काकभुशुंडि जी द्वारा गरुड़ जी (खगेसा) को दिया गया यह ज्ञान है कि भगवान की भक्ति के बिना सांसारिक क्लेश (दुःख) दूर नहीं होते। यह चौपाई बताती है कि ईश्वर का स्मरण/भजन ही दुखों का एकमात्र निवारण है और राम जी की कृपा के बिना उन्हें जाना नहीं जा सकता।
निज अनुभव अब कहउँ खगेसा।
बिनु हरि भजन न जाहिं कलेसा।।
भावार्थ (हिंदी में):
काकभुशुंडि जी कहते हैं- "हे पक्षीराज गरुड़ (खगेसा)! अब मैं अपना निजी अनुभव कहता हूँ कि भगवान् हरि के भजन (भक्ति, नाम स्मरण) के बिना जीवन के क्लेश/दुःख दूर नहीं होते हैं"।
संदर्भ: यह प्रसंग रामचरितमानस में तब आता है जब काकभुशुंडि जी अपने पूर्व जन्म की कथा सुनाते हुए भक्ति का महत्व समझाते हैं।
सार: सांसारिक दुखों, मानसिक अशांति और भव-बंधन से मुक्ति पाने का एकमात्र उपाय प्रभु की भक्ति है।
अगली पंक्ति:
"राम कृपा बिनु सुनु खगराई। जानि न जाइ राम प्रभुताई॥"
अर्थ: हे गरुड़! रामजी की कृपा के बिना उनकी प्रभुता/महिमा को नहीं समझा जा सकता। #

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