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गंगाजल की शुद्धता केवल आस्था नहीं, बल्कि एक गहरा विज्ञान है।

ब्रिटिश काल में, महाराजा माधोसिंह द्वितीय ने लंदन यात्रा के दौरान 8,000 लीटर गंगाजल चाँदी के कलशों में साथ रखा, क्योंकि यह महीनों तक “ताज़ा और मधुर” रहता था।

आधुनिक विज्ञान भी इसे मानता है—गंगा में अन्य नदियों की तुलना में 25 गुना अधिक ऑक्सीजन और विशेष ‘बैक्टिरियोफेज’ पाए जाते हैं, जो हानिकारक बैक्टीरिया को नष्ट करते हैं।

यह जल अपनी आत्म-शुद्धिकरण की शक्ति से स्वयं को जीवित और पवित्र बनाए रखता है।

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