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रमेश गुप्ता की 2019 में हार्ट अटैक से मृत्यु हो गई। उम्र सिर्फ 54 साल।

उनके पास ₹50 लाख की टर्म इंश्योरेंस पॉलिसी थी। 11 साल तक एक भी प्रीमियम मिस नहीं किया।

उनकी पत्नी ने क्लेम फाइल किया।
इंश्योरेंस कंपनी बोली: “हमें जांच करनी होगी।”

जांच 3 साल तक चली।
बार-बार नए दस्तावेज मांगे गए।
वह हर बार देती रहीं, और हर बार नई मांग आ जाती।

इस बीच हालात बिगड़ गए—
घर की EMI नहीं भर पाईं,
गाड़ी बेचनी पड़ी,
रिश्तेदारों से उधार लेना पड़ा।

2022 में कंपनी ने क्लेम रिजेक्ट कर दिया।
कारण बताया “पहले से बीमारी छुपाई गई थी।”

वो “बीमारी” क्या थी?
सिर्फ हल्का ब्लड प्रेशर,
जो 2015 के एक रूटीन चेकअप में नोट हुआ था।
न कोई इलाज, न कोई दवा।

पत्नी ने हार नहीं मानी।
IRDAI और फिर कंज्यूमर कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

कोर्ट का साफ फैसला आया—
जिस बीमारी का कभी इलाज नहीं हुआ,
जो कभी स्वास्थ्य को प्रभावित नहीं करती,
उसे 11 साल बाद क्लेम रिजेक्ट करने का आधार नहीं बनाया जा सकता।

आदेश दिया गया:
₹50 लाख की पूरी राशि,
2019 से 9% ब्याज के साथ,
और ₹1 लाख मानसिक उत्पीड़न के लिए।

3 साल तक एक विधवा को घुमाया गया।
लेकिन अदालत ने उसका हक वापस दिलाया—पूरा, ब्याज सहित।

याद रखिए:
अगर आपका इंश्योरेंस क्लेम “नॉन-डिस्क्लोज़र” के नाम पर खारिज हो
तो चुप मत बैठिए, लड़िए।

अदालतें बार-बार कह चुकी हैं
छोटी, बिना इलाज वाली स्थितियों को आधार बनाकर क्लेम रिजेक्ट करना गलत है।