एलपीजी सिलेंडर की सुरक्षा और उसका काम करने का वैज्ञानिक तरीका बेहद दिलचस्प और महत्वपूर्ण है, जिसे हम अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं। आमतौर पर लोगों को लगता है कि सिलेंडर पूरी तरह गैस से भरा होना चाहिए, लेकिन सच्चाई यह है कि उसमें लगभग 15% खाली जगह (Ullage Space) जानबूझकर छोड़ी जाती है, और यही खाली हिस्सा सिलेंडर की सबसे बड़ी सुरक्षा ढाल होता है। सिलेंडर के अंदर एलपीजी बहुत अधिक दबाव में तरल (Liquid) रूप में मौजूद होती है, लेकिन जैसे ही ऊपर थोड़ी जगह मिलती है, यह तरल गैस में बदलने लगती है। जब हम चूल्हा जलाते हैं, तो ऊपर जमा यही गैस बाहर निकलती है, जिससे अंदर का दबाव कम होता है और नीचे का तरल फिर से वाष्प बनकर उस जगह को भर देता है। अगर सिलेंडर पूरी तरह लिक्विड से भरा होता, तो यह प्रक्रिया संभव ही नहीं हो पाती।
दूसरी ओर, तापमान का प्रभाव भी बहुत अहम भूमिका निभाता है। एलपीजी में थर्मल एक्सपैंशन (Thermal Expansion) बहुत अधिक होता है, यानी गर्मी मिलने पर यह तेजी से फैलती है। गर्मियों में या रसोई की गर्मी से जब सिलेंडर का तापमान बढ़ता है, तो अंदर का लिक्विड फैलने लगता है। ऐसे में वही 15% खाली जगह इस फैलाव को समायोजित करने का काम करती है। यदि यह जगह न हो, तो फैलता हुआ लिक्विड सिलेंडर की दीवारों पर अत्यधिक दबाव डाल सकता है, जिससे विस्फोट जैसी खतरनाक स्थिति बन सकती है। इसके अलावा, अगर सिलेंडर पूरी तरह भरा हो, तो रेगुलेटर खोलते समय गैस के बजाय तरल एलपीजी पाइप में आ सकती है, जो अचानक फैलकर खतरनाक आग का कारण बन सकती है। यही खाली जगह सुनिश्चित करती है कि केवल गैस ही बाहर निकले, न कि तरल।
इसी वैज्ञानिक और सुरक्षा सिद्धांत के आधार पर घरेलू एलपीजी सिलेंडर में 14.2 किलो गैस ही भरी जाती है, जबकि उसकी कुल जल क्षमता (वाटर कैपेसिटी) लगभग 33.3 लीटर होती है। यह मात्रा इस तरह तय की गई है कि सिलेंडर के अंदर सुरक्षित दबाव बना रहे और एक जरूरी सुरक्षा मार्जिन हमेशा मौजूद रहे। यानी यह 15% खाली जगह सिर्फ एक डिजाइन नहीं, बल्कि एक जीवन रक्षक व्यवस्था है, जो हमें अनजाने में बड़े खतरों से बचाती है।