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मेरा नाम मोहनलाल है, बिहार के गया जिले के पोची गांव का रहने वाला हूं। शायद मैं दुनिया का इकलौता इंसान हूं जिसने जिंदा रहते अपनी ही श'व यात्रा देखी। यह सब मैंने मजाक में नहीं, बल्कि एक खास मकसद से किया—जानना चाहता था कि मेरे जाने के बाद लोग मेरे बारे में क्या सोचेंगे।
मेरे कुछ करीबी लोगों को ही इस योजना के बारे में पता था। सारी तैयारियां बिल्कुल असली श'व यात्रा की तरह की गईं—मुझे नहलाया गया, क'फ'न पहनाया गया, ठ'ठरी पर लि'टाया गया और फूल-मालाओं से सजाया गया। मेरी ना'क में रूई र'ख दी गई और मैंने सां'स तक रो'क ली, ताकि कोई शक न करे। जो लोग सच्चाई नहीं जानते थे, वे सच में दुखी थे और रो रहे थे।
जब श'व यात्रा शुरू हुई, तो लोग “राम नाम सत्य है” बोल रहे थे। मैं अंदर ही अंदर मुस्कुरा रहा था और सोच रहा था—“सत्य तो मैं ही हूं, बस थोड़ी देर में उठकर साबित कर दूंगा।” श्म'शान तक पहुंचते-पहुंचते मैंने लोगों की बातें सुनीं—कोई मेरी तारीफ कर रहा था, कोई मेरी अचानक मौत पर हैरान था, तो कोई मेरे बच्चों के बारे में पूछ रहा था। उस पल मुझे एहसास हुआ कि इंसान के जाने के बाद वही याद किया जाता है, जैसा उसने जीवन जिया होता है।
जब दा'ह संस्कार की बारी आई, तो मैं अचानक उठ बैठा। वहां मौजूद लोग हैरान रह गए। मैंने सबको बताया कि यह सब मैंने इसलिए किया ताकि देख सकूं कि मेरी मौत पर कौन आता है और लोग क्या कहते हैं। साथ ही, अपने बनवाए “मुक्तिधाम” श्म'शान घाट का उद्घाटन भी अपने ही “शव” से करना चाहता था।
मेरी जिंदगी में कई उतार-चढ़ाव आए—वायुसेना में 21 साल सेवा देने के बाद गांव में कोचिंग सेंटर शुरू किया। पत्नी के निधन और बच्चों से दूरी ने मुझे अकेला जरूर किया, लेकिन मैंने खुद को समाज सेवा में लगा दिया। पत्नी की याद में अस्पताल बनवाया और अपने पैसों से श्म'शान को “मुक्तिधाम” में बदला।
मैं दशरथ मांझी और गौतम बुद्ध से प्रेरणा लेकर अब ऐसा जीवन जीना चाहता हूं, जिसे याद करके लोग आखिरी समय में भी सिर्फ अच्छी बातें करें।

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