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अप्रैल 2026 के मध्य में शुरू हुआ एक छोटा सा मामला देखते ही देखते इतना बड़ा बन गया कि पूरे देश में बहस, विरोध और बॉयकॉट की लहर दौड़ गई, और इसकी शुरुआत हुई मुंबई के एक Lenskart शोरूम से, जहां सोशल मीडिया पर यह दावा वायरल हुआ कि स्टोर के मैनेजर मोहसिन खान ने वहां काम करने वाले हिंदू कर्मचारियों को बिंदी और तिलक लगाकर ड्यूटी पर आने से मना कर दिया है और इसे कंपनी की पॉलिसी बताया गया, बस यही वो चिंगारी थी जिसने लोगों के गुस्से को भड़का दिया और देखते ही देखते यह मुद्दा पूरे इंटरनेट पर छा गया,
जैसे ही यह खबर फैलनी शुरू हुई, Nazia Elahi Khan अपनी टीम के साथ सीधे उस शोरूम पहुंच गईं और वहीं से कहानी ने नया मोड़ ले लिया, उन्होंने स्टोर के अंदर जाकर कर्मचारियों को अपने हाथों से तिलक लगाया और मैनेजर के सामने खड़े होकर ‘जय श्री राम’ के नारे लगाए, इस पूरे घटनाक्रम का वीडियो रिकॉर्ड कर सोशल मीडिया पर डाला गया जो कुछ ही घंटों में वायरल हो गया और लाखों लोगों तक पहुंच गया,
इसके बाद जो हुआ वह और भी ज्यादा चौंकाने वाला था, सोशल मीडिया पर #boycottlenskart ट्रेंड करने लगा, लोग खुलकर विरोध में उतर आए, इसी बीच एक और वीडियो सामने आया जिसमें एक व्यक्ति कैमरे के सामने Lenskart के चश्मे दिखाता है, उन्हें बीच से तोड़ देता है और फिर स्टोर के अंदर जाकर डस्टबिन में फेंक देता है, मानो यह संदेश दे रहा हो कि अगर हमारे धर्म का सम्मान नहीं होगा तो हम ऐसे ब्रांड का बहिष्कार करेंगे, यह वीडियो आग में घी डालने जैसा साबित हुआ और विरोध और तेज हो गया,
लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई, विवाद बढ़ने के बाद उसी स्टोर के कुछ कर्मचारियों के वीडियो सामने आए जिसमें उन्होंने साफ कहा कि उन्हें कभी भी तिलक या बिंदी लगाने से नहीं रोका गया और यह पूरी बात एक गलतफहमी या बढ़ा-चढ़ाकर पेश की गई खबर थी, वहीं मैनेजर की तरफ से भी सफाई दी गई कि उन्होंने किसी की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने जैसी कोई बात नहीं कही,
अब यह मामला सिर्फ एक स्टोर तक सीमित नहीं रहा बल्कि पूरे देश में एक बड़े डिस्कशन में बदल गया, जहां एक तरफ लोग इसे धार्मिक पहचान और अधिकार का मुद्दा मान रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ कुछ लोग इसे सोची-समझी रणनीति और सोशल मीडिया द्वारा बढ़ाया गया विवाद बता रहे हैं, इस पूरे घटनाक्रम का असर ब्रांड की छवि पर भी साफ दिखा, कई लोगों ने ऑर्डर कैंसिल किए, रेटिंग्स गिराईं और कंपनी को भारी ट्रोलिंग का सामना करना पड़ा,
आखिर में सवाल वही खड़ा होता है कि क्या यह सच में धार्मिक पहचान बनाम कॉर्पोरेट नियमों की लड़ाई है या फिर सोशल मीडिया के जरिए बढ़ाया गया एक ऐसा विवाद जो धीरे-धीरे अपनी असली सच्चाई से दूर होता चला गया, आप इस पूरे मामले को किस नजर से देखते हैं, क्या यह सही विरोध था या फिर एक गलतफहमी जिसने आग पकड़ ली।
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