जब मुगलों की सेनाएं असम सेना को खदेड़ रही थीं, ऐसे में अकेला लाचित बोरफुकन ही था जो अकेले मुगलों पर कहर बनकर टूट पड़ा।
लाचित बोरफुकन ने अपने सैनिकों को ललकारा
वीरों! मुगलों को इस बार ऐसा सबक सिखाओ कि फिर कभी भविष्य में असम की ओर रुख करने का ये साहस न कर सकें। यह आखरी और निर्णायक युद्ध होना चाहिए। इस अवसर को चूक गये तो ये माटी तुम्हें कभी क्षमा नहीं करेगी।
अहोम के राजा चक्रध्वज सिंह ने मुगलों के खिलाफ क्रांति की मशाल थाम ली। चक्रध्वज ने मुगलों से लड़ने के लिए अपने मंत्री मोमाई तामुली बरुआ के पुत्र लाचित बोरफुकन को अपनी सेना का सेनापति बनाया ।
लाचित बोरफुकन भारत के गौरव हैं। 1671 में सरायघाट में ब्रह्मपुत्र नदी में अहोम सेना और मुगलों के बीच ऐतिहासिक लड़ाई हुई, जिसने पानी में लड़ाई की तकनीक को नए आयाम दिए।
सराइघाट के युद्ध में उनके द्वारा प्रदर्शित अपूर्व साहस को कभी भी भुलाया नहीं जा सकता है। लाचित ने बीमार होते हुए भी युद्ध किया और अपनी अदम्य नेतृत्व क्षमता के कारण सरायघाट की लड़ाई में लगभग 4000 मुगल सैनिकों को मार गिराया।लाचित ने अपनी सेना को गुरिल्ला युद्ध तथा नौसेना युद्ध में निपुण किया।
NDA में जो बेस्ट कैडेट होता है, उसको एक स्वर्ण पदक से सम्मानित किया जाता है, उस पदक का नाम है “लचित बोरफुकन”
प्रसिद्ध इतिहासकार सूर्यकुमार भूयान ने उनको उनकी रणनीति और बहादुरी के कारण भारत के उत्तर पूर्व क्षेत्र का “शिवाजी” कहकर संबोधित किया है
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