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निस्वार्थ भक्ति और भगवान का ऋण
यह कथा एक ऐसे निस्वार्थ भक्त की है जिसने जीवन भर भगवान का नाम जपा, लेकिन कभी अपने लिए कुछ नहीं माँगा। एक दिन बांके बिहारी मंदिर में भगवान के दर्शन न होने पर वे अत्यधिक व्यथित हो गए। उन्हें लगा कि शायद उनके पाप बढ़ गए हैं, इसलिए वे आत्मग्लानि में यमुना में प्राण त्यागने चल दिए।
तभी अंतर्यामी भगवान ने एक लीला रची। उन्होंने एक कोढ़ी को उस भक्त से आशीर्वाद लेने भेजा। भक्त ने स्वयं को 'पापी' मानते हुए अनमने भाव से कोढ़ी को स्वस्थ होने का आशीर्वाद दिया और चमत्कारिक रूप से वह कोढ़ी ठीक हो गया। उसी क्षण भगवान प्रकट हुए।
भगवान ने प्रकट होकर रहस्य उजागर किया कि भक्त की निष्काम भक्ति के कारण भगवान उन पर 'ऋणी' हो गए थे। भक्त के पुण्य इतने बढ़ गए थे कि भगवान उनके सामने आने में संकोच कर रहे थे। कोढ़ी को आशीर्वाद देकर भक्त ने अपने पुण्यों का कुछ अंश खर्च कर दिया, जिससे भगवान थोड़े ऋण-मुक्त हुए और अपने प्रिय भक्त को दर्शन दे पाए।
सीख: निस्वार्थ भाव से की गई भक्ति भगवान को भी प्रेम के बंधन में बाँध देती है।
राधे राधे
मार्गदर्शक - श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज
प्रेरणास्त्रोत - श्री श्री १०८ श्री स्वामी हरिहरानंद जी महाराज , होलीपुरा

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