तुलजाभवानी - भवानिअष्टक-उपासना
मां तुलजा जागृत स्वरुप हे ये ध्यान देवे
सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सवार्थ साधिके शरण्येत्र्यंबके गौरी नारायणी नमोस्तुते "
महाराष्ट्र के तुलजापुरमे माता तुलजा भवानी का अद्भुत चमत्कारी मंदिर स्थित है। महामाया ने कात्यायनी स्वरूप धारण करके महिषासुर का वध किया और भक्तोंकी भावना स्वीकार कर इस पर्वत पर चिर स्थान लिया। अष्टभुजावाली माता तुलजाभवानी को महिषासुरमर्दिनी नाम से भी जाना जाता है। माता की इस मूर्ति को एक जगह से दूसरी जगह पर भी ले जाया सकता है। इस मंदिर के मुख्य भवन के पूर्व में शयनकक्ष है जिसमे सोने के लिए चांदी से बनाया हुआ पलंग है।
साल में तीन बार माता इस शयनकक्ष में विश्राम करती है। इस तरह की परमपरा केवल इसी मंदिर है अन्य किसी भी जगह पर इस तरह की प्रथा नहीं। इस मन्दिर के गुबंद पर सुन्दर नक्काशी बनायीं गयी है।
माता की मूर्ति की स्थापना श्रीयंत्र पर आदि शंकराचार्यजी ने की थी। देवी की इस मूर्ति की सबसे खास बात यह है की माता की मूर्ति केवल एक ही जगह पर स्थापित नहीं की गयी। इसका मतलब देवी की इस मूर्ति को दूसरी जगह पर भी रखा जा सकता है, देवी की मूर्ति किसी भी दिशा में रखी जा सकती है।
इसलिए इस मूर्ति को चल मूर्ति भी कहा जाता है। साल में तीन बार देवी की मूर्ति को मंदिर के बाहर निकाला जाता है क्यों की साल के तीन दिन काफी विशेष माने जाते है और इन अवसर पर देवी को परिक्रमा करने लिए मंदिर के बाहर निकाला जाता है और मंदिर के चारो तरफ़ माता की मूर्ति को घुमाया जाता है।