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किसी पर भरोसा ना करें...
अपने बच्चों का स्वयं ध्यान रखें...
दिलरोज कौर से मिलिए। ये ढाई साल की छोटी मासूम बच्ची थी। अपने मां-बाप और दादा-दादी की आंखों की प्यारी। लुधियाना के शिमलापुरी की गलियों में उसकी खिलखिलाहट गूंजती थी, लेकिन 28 नवंबर 2021 की उस मनहूस दोपहर को एक ऐसा साया मंडराया जिसने इस मासूमियत को हमेशा के लिए मिट्टी में दफन कर दिया ।
उस दिन दोपहर के करीब 2:15 बजे थे। दिलरोज अपनी दादी हरविंदर कौर के साथ घर के बाहर खेल रही थी । दादी बस दो मिनट के लिए पानी पीने अंदर गईं और जब वापस आईं, तो दिलरोज गायब थी। सीसीटीवी फुटेज में जो दिखा, उसने सबका दिल दहला दिया। पड़ोस में रहने वाली नीलम, जिसे दिलरोज 'बुआ' कहकर बुलाती थी, उसे अपनी एक्टिवा पर बिठाकर ले जा रही थी ।
हैरानी की बात यह थी कि मासूम दिलरोज स्कूटी पर आगे खड़ी होकर बहुत खुश दिख रही थी। उसे लग रहा था कि 'बुआ' उसे सैर कराने या कुछ खिलाने ले जा रही है । उसे क्या पता था कि जिस पर वह इतना भरोसा कर रही है, वही उसकी मौत की इबारत लिख चुकी है।
नीलम उस बच्ची को करीब 13 किलोमीटर दूर जालंधर जीटी रोड पर एक सुनसान प्लॉट पर ले गई । वहां उसने पहले से ही एक गड्ढा खोद रखा था, जो बताता है कि यह कोई अचानक लिया गया फैसला नहीं बल्कि एक सोची-समझी साजिश थी ।
क्रूरता की सारी हदें पार करते हुए, नीलम ने मासूम दिलरोज के मुंह और नाक में जबरन रेत भर दी ताकि वह चिल्ला न सके और फिर उसे उस गड्ढे में उल्टा करके जिंदा दफना दिया । मेडिकल रिपोर्ट के अनुसार, रेत बच्ची के फेफड़ों तक पहुंच गई थी, जिससे दम घुटने (Asphyxiation) के कारण कुछ ही सेकंड में उसकी मौत हो गई।
पुलिस जांच और अदालत की कार्यवाही में जो सच सामने आया, वह समाज की कड़वी हकीकत बयां करता है। नीलम एक तलाकशुदा महिला थी और उसके अपने दो बच्चे थे । वह दिलरोज के परिवार की खुशहाली और उनके बच्चों को मिलने वाली सुख-सुविधाओं से जलती थी ।
दिलरोज के पिता हरप्रीत सिंह पंजाब पुलिस में थे । परिवार ने नीलम के व्यवहार को देखते हुए अपनी बहू को उससे बात करने से मना किया था । इसी सामाजिक तिरस्कार और हीन भावना ने नीलम के अंदर ऐसी नफरत भर दी कि उसने मासूम बच्ची से बदला लेने की ठान ली
अप्रैल 2024 में लुधियाना की सत्र अदालत ने इस मामले को "दुर्लभतम से दुर्लभ" (Rarest of Rare) करार दिया । जज मुनीश सिंघल ने फैसला सुनाते हुए कहा कि एक मासूम बच्ची को जिंदा दफन करना न केवल क्रूर है, बल्कि यह मानवता के खिलाफ अपराध है ।
अदालत ने नीलम को मृत्युदंड (फांसी की सजा) सुनाई। फैसला सुनते ही कोर्ट परिसर में मौजूद दिलरोज के माता-पिता की आंखों से आंसू छलक पड़े, जिन्हें ढाई साल के लंबे इंतजार के बाद न्याय मिला था l
हालांकि सत्र अदालत ने फांसी की सजा सुना दी है, लेकिन भारतीय कानून के अनुसार इसे पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय से पुष्टि मिलना अनिवार्य है । समाज आज भी उस दिन का इंतजार कर रहा है जब दिलरोज की रूह को पूरी तरह शांति मिलेगी। यह कहानी हमें याद दिलाती है कि हमारे आसपास छिपी ईर्ष्या और नफरत कितनी खतरनाक हो सकती है।

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