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जब सिस्टम की फाइलों में जमीर मर जाता है, तब एक आम आदमी को अपना हक पाने के लिए मौत की नुमाइश करनी पड़ती है।
सिस्टम की इस बेशर्मी पर अब क्या ही लिखा जाए, जहाँ कागज़ों का वज़न एक गरीब की तकलीफ से कहीं ज्यादा भारी हो गया है! जब नियम-कायदे इतने अंधे हो जाएं कि उन्हें एक जिंदा इंसान की सिसकियां सुनाई न दें और मर चुके इंसान का सबूत मांगने के लिए वो किसी को उसकी हदों तक तोड़ दें, तो समझ लेना चाहिए कि हमारा समाज अंदर से मर चुका है। धिक्कार है ऐसी तरक्की पर और ऐसी डिजिटल दुनिया पर, जहाँ एक भाई को अपनी बहन के हक के लिए उसकी रूह तक को सड़कों पर लाकर खड़ा करना पड़े, सिर्फ इसलिए क्योंकि साहब को फाइल पूरी करनी थी।
ये बाबूशाही और दफ्तरों के चक्कर दरअसल इंसानियत का कत्ल करने के कारखाने बन चुके हैं। हम बड़ी-बड़ी बातें तो बहुत करते हैं, लेकिन असलियत ये है कि आज भी एक आम आदमी के लिए इंसाफ और अपना ही हक पाना किसी जंग से कम नहीं है। क्या फायदा उन कंप्यूटरों और लंबी-चौड़ी मशीनों का, जो एक बेबस इंसान की आंखों का दर्द नहीं पढ़ सकतीं? ये सिर्फ एक बैंक या एक विभाग की बात नहीं है, ये उस सड़े हुए दिमाग की कहानी है जो कहता है कि 'इंसान मर जाए तो मर जाए, बस कागज नहीं छूटना चाहिए'। अगर किसी की लाचारी का ऐसा तमाशा बनाने के बाद भी हुक्मरानों की नींद नहीं टूटती, तो मान लीजिए कि हम एक ऐसे दौर में जी रहे हैं जहाँ सिस्टम को चलाने वाले इंसान नहीं, बल्कि पत्थर के पुतले हैं। अब और कितनी मौतें देखोगे साहब, एक आदमी को यकीन दिलाने के लिए और कितना गिरना पड़ेगा?
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