⛽️ #e85 #पेट्रोल: प्रगति का मार्ग या जल-संकट का नया द्वार?
​केंद्र सरकार का नया ड्राफ्ट यदि हकीकत बनता है, तो आने वाले समय में हमारी गाड़ियां पूरी तरह एथेनॉल (E100/E85) पर दौड़ेंगी। लेकिन इस 'हरित ईंधन' के पीछे का सफ़ेद सच बहुत गहरा और चिंताजनक है।
​💧 पानी का गणित: एक लीटर ईंधन बनाम हजारों लीटर पानी
​इंडिया टुडे की एक चौंकाने वाली रिपोर्ट के अनुसार, 1 लीटर एथेनॉल बनाने के लिए 10,790 लीटर पानी की बलि चढ़ानी पड़ती है (चावल उगाने से लेकर प्रोसेसिंग तक)। मोटे तौर पर 2.5 से 3 किलो चावल तब जाकर 1 लीटर एथेनॉल में तब्दील होता है। गन्ने की स्थिति भी बहुत बेहतर नहीं है।
​📺 मीडिया का दोहरा मापदंड और नैरेटिव का खेल
​विडंबना देखिए, जब यही किसान अपनी मेहनत से देश का पेट भरने के लिए धान या गन्ना उगाता है, तो कॉरपोरेट मीडिया उसे 'ग्राउंड वाटर का दुश्मन' घोषित कर देता है। एयर-कंडीशंड कमरों में बैठे लोग, जिन्होंने कभी मिट्टी को हाथ तक नहीं लगाया, किसानों पर 'भूजल के अतिदोहन' का ठप्पा लगा देते हैं।
​सच्चाई यह है: शहरों में फ्लश और विलासिता में जितना पानी बहा दिया जाता है, वह खेती की जरूरत से कहीं ज्यादा है।
​असली खतरा अब है: जब औद्योगिक इकाइयां 1 लीटर ईंधन के लिए 10,000 लीटर पानी का उपयोग करेंगी और बिना ट्रीट किए 'वेस्ट वाटर' को जमीन में उतारेंगी, तो न केवल जलस्तर गिरेगा बल्कि बीमारियां घर-घर पहुँचेंगी।
​⚖️ किसान बनाम कॉरपोरेट: अधिकारों की लड़ाई
​आज का किसान अपनी ही जमीन पर 'पराया' महसूस कर रहा है:
​ड्राई जोन का शिकंजा: खादर जैसी उपजाऊ जमीन पर भी किसान अगर ट्यूबवेल लगवाता है, तो सरकारें 'नेचुरल रिसोर्सेज' की रक्षा का हवाला देकर उसे बंद करवा देती हैं।
​कॉरपोरेट को खुली छूट: वही संसाधन जब 'राजनीतिक संरक्षण' प्राप्त बड़े घरानों के हाथ में जाते हैं, तो सारे नियम और ड्राई जोन के खतरे अचानक गायब हो जाते हैं।
​सवाल सीधा है: क्या किसान का पानी 'बर्बादी' है और कॉरपोरेट का वही पानी इस्तेमाल करना 'विकास'? अगर जल संरक्षण जरूरी है, तो इसके मानक सबके लिए एक समान क्यों नहीं?
​सोचिए, जब गाड़ियां एथेनॉल से सरपट दौड़ेंगी, तब क्या हमारे पास पीने के लिए पानी बचेगा?
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