अयोध्या के एक परम विद्वान भक्त थे , वे माता सीता को अपनी बहू और भगवान राम को अपना बेटा (लाला) मानते थे। उनका भाव इतना सच्चा था कि जब भी वे मंदिर जाते, तो मर्यादावश पुजारी से कहते कि "बहू के सामने का पर्दा कर दो"। एक बार जब नए पुजारी ने पर्दा नहीं किया, तो भक्त के भाव के कारण मंदिर के दरवाजे का सीता जी के सामने जो पट था वो अपने आप जोर से बंद हो गया। यह इस बात का प्रमाण था कि भगवान भक्त के उस नाता-रिश्ते को स्वीकार करते हैं।