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भक्त तुलसीदास जी की दृष्टि में " पशु " एवं " ताड़ना "
पिछले अंकों में ढोल , गंवार एवं शूद्र के साथ " ताड़ना " का क्या संबंध है ? इस पर चर्चा की जा चुकी है। इस अंक में " पशु " का " ताड़ना " के साथ क्या संबंध है ? इस पर प्रकाश डाला जा रहा है।
किसी भी शब्द के अर्थ को समझने के लिए उस ग्रंथ का समग्रता से अध्ययन कर ही अर्थ निकालना चाहिए अन्यथा अर्थ के अनर्थ होने की संभावना अधिक रहती है। ऐसा ही एक शब्द है - पशु।
साधारणतः हम " पशु " शब्द से चतुष्पद प्राणी यानी चार पैरोंवाले जीव को समझते हैं , जिनको पूंछ होती है। कुछ जीवों में पूंछ के साथ-साथ सींग भी होते हैं।
यहां ' ताड़ना ' का तात्पर्य पशुओं की देखरेख करने से है।
गोस्वामी तुलसीदास जी ने अपने महाकाव्य रामचरितमानस में कई बोलियों / भाषाओं के शब्दों का समायोजन किया है। जैसे- जोहार एवं ताड़ना।
" जोहार " शब्द का प्रयोग हमारे संथाली बंधुगण अभिवादन के लिए करते हैं। इसी प्रकार बांग्ला भाषा में पशुओं के भगाने को ' ताड़ाओ ' कहते हैं। उदाहरणस्वरूप - छागोल ताड़ाओ अर्थात् बकरी को भगाओ।
इस प्रकार पशुओं के लिए ताड़ना शब्द का अभिप्राय उसकी निगरानी करने से या उसे हटाने से है।
हम सभी का बौद्धिक , मानसिक एवं आध्यात्मिक स्तर तुलसीदास जी के समकक्ष नहीं है , अतः हम अपने स्तर के अनुसार शब्द एवं उसके अर्थ को आरोपित कर देते हैं। इसलिए रामचरितमानस के उत्तरकांड में तुलसीदास जी लिखते हैं -

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