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कुछ लोग सिर्फ कला का प्रदर्शन नहीं करते, बल्कि पूरी विरासत को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने का काम करते हैं।
Bhimavva Doddabalappa Shillekyathara ऐसी ही प्रेरणादायक शख्सियत हैं, जिन्होंने अपना पूरा जीवन कर्नाटक की 800 साल पुरानी पारंपरिक छाया कठपुतली कला “तोगलु गोंबेआट्टा” को समर्पित कर दिया।
96 साल की उम्र में भी उनका जुनून और समर्पण लोगों को प्रेरित कर रहा है। कर्नाटक के कोप्पल ज़िले के मोरानाला गांव में जन्मीं भीमव्वा जी ने कभी कोई औपचारिक ट्रेनिंग नहीं ली। उन्होंने अपने बड़ों से सीखते हुए इस दुर्लभ कला में महारत हासिल की।
चमड़े की खूबसूरत कठपुतलियों और रोशनी की मदद से वे रामायण और महाभारत की कहानियों को जीवंत रूप में प्रस्तुत करती हैं। पिछले 70 वर्षों से वह इस कला को बचाने और दुनिया तक पहुंचाने का काम कर रही हैं।
सबसे गर्व की बात यह है कि वह भारत ही नहीं, बल्कि 12 से अधिक देशों में इस पारंपरिक भारतीय कला का प्रदर्शन कर चुकी हैं।
उनके इसी अद्भुत योगदान के लिए उन्हें Padma Shri सम्मान से भी नवाजा गया। भीमव्वा जी की कहानी यह याद दिलाती है कि असली विरासत सिर्फ किताबों में नहीं…
बल्कि उन लोगों में जीवित रहती है, जो पूरी जिंदगी उसे बचाने में लगा देते हैं।
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