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इस्लाम के आगमन से पहले अरब देशों में बहुदेववाद और मूर्ति पूजा का प्रचलन था। उस दौर में मक्का, मदीना और आसपास के क्षेत्रों में कई जनजातियां अपने-अपने देवी-देवताओं की पूजा करती थीं। मक्का स्थित काबा उस समय भी एक बड़ा धार्मिक केंद्र माना जाता था, जहां 360 मूर्तियां स्थापित थीं और हर जनजाति की अपनी अलग पहचान जुड़ी हुई थी।

प्राचीन अरब की तीन प्रमुख देवियां अल-लात, अल-उज्जा और मनात थीं, जिन्हें लोग ईश्वर की बेटियां मानते थे। मान्यता थी कि ये देवियां सुख, समृद्धि, शक्ति, प्रेम, भाग्य और मृत्यु जैसी शक्तियों की स्वामिनी हैं। अल-लात को धरती और समृद्धि की देवी माना जाता था, अल-उज्जा को युद्ध और शक्ति की देवी, जबकि मनात को भाग्य और मृत्यु की देवी के रूप में पूजा जाता था।

उस समय काबा केवल पूजा का ही नहीं, बल्कि व्यापार और सामाजिक मेल-जोल का भी प्रमुख केंद्र था। यहां विभिन्न जनजातियां धार्मिक आस्था के साथ-साथ व्यापारिक गतिविधियों के लिए भी एकत्रित होती थीं। काबा में मौजूद सबसे प्रमुख देवता हुबल को युद्ध और वर्षा का देवता माना जाता था।

इतिहासकारों के अनुसार, इस्लाम से पहले के इस दौर को ‘जाहिलिया’ का काल कहा जाता है। बाद में पैगंबर मोहम्मद और उनके अनुयायियों ने मक्का पर विजय प्राप्त करने के बाद काबा से सभी मूर्तियों को हटा दिया। इसके साथ ही अरब में बहुदेववाद का अंत हुआ और एकेश्वरवाद यानी केवल एक अल्लाह की इबादत की परंपरा शुरू हुई।

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