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और फिर एक दिन
हर शाम घर की देहरियों पर बैठकर
सबके लौटने का इंतजार करती मांएं
बिना किसी पूर्व सूचना के
बिना किसी तैयारी
बिन पूछे बिन कहे -सुने
बिन किसी शिकायत चुपचाप
अचानक चली जाती हैं उस सफर पर
जहां से लौटकर फिर कभी कोई नहीं आता।
​सुना है कि मांएं ऐसे ही जाती हैं
सबसे छिपकर, नजर बचाकर
कि कहीं कोई साथ चलने को न कह दे...
​पीछे छूट जाती है रसोई में रखी
आधी पीसी हुई हल्दी,
तुलसी के चौरे पर अधजला दीपक
और वह पुराना संदूक
जिसमें आज भी महकती है
उनकी नई नकोर सूती साड़ियों की
चिर-परिचित गंध।
​वो नहीं ले जातीं अपने साथ
अपनी मनपसंद चांदी की चूड़ियां,
वो अहोई वाली माला
वो समेटकर रख जाती हैं
हर एक सहेज कर रखी चीज़,
कि बच्चों को कभी कोई तकलीफ न हो।
बस ले जाती हैं तो अपने आंचल का वो कोना,
जिससे उन्होंने जीवन भर सबके आंसू पोंछे थे।
और फिर ​अब उस सूनी देहरी पर
सिर्फ हवाएं आकर दरवाज़ा
खटखटाया करती हैं,
और घर के हर कोने से
एक खामोश आहट आती है।
वह जो हर छोटी चोट पर
'हाए रे मेरा बच्चा' कहती थी,
खुद अनंत काल के लिए
चिर निद्रा में लीन हो जाती है।
​चूल्हा ठंडा पड़ा है,
और बिछौना उदास है,
दीवार पर टंगी तस्वीर में
उनकी आंखें अब भी मुस्कुराती हैं।
पर उस मुस्कान के पीछे का अकेलापन
कोई नहीं देख नहीं पाता है।
​सचमुच, मांएं जब जाती हैं,
तो कोई शोर नहीं करतीं,
वो बस चुपके से
आसमान का एक तारा बन जाती हैं।
ताकि जब हम रात को अकेले में रोएं,
तो वो ऊपर से हमें देख सकें,
और हम उनके न होने के अंधकार में भी,
उनकी ममता की हल्की सी रोशनी पा सकें।
वैसे जाती हुई मां से
अगर एक बार कहकर देखा जाए कि
"मां भूख लगी है"
हो सकता है कि वह
फिर से उठ खड़ी हो जाए।

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