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राजस्थान की धरती पर स्थित चितौड़गढ़ केवल एक किला नहीं, बल्कि त्याग, स्वाभिमान और बलिदान का अमर प्रतीक है। इसे "जौहर भूमि" इसलिए कहा जाता है क्योंकि यहां मातृभूमि, धर्म और सम्मान की रक्षा के लिए राजपूत क्षत्राणियों ने तीन बार जौहर किया।

1. प्रथम जौहर (1303 ई.)

जब रानी पद्मिनी के समय अलाउदीन खिलजी ने चित्तौड़गढ़ को घेरा, तब हजारों राजपूत महिलाओं ने सम्मान की रक्षा हेतु जौहर किया और वीरों ने साका कर रणभूमि में प्राण न्यौछावर कर दिए।

2. द्वितीय जौहर (1535 ई.)

रानी कर्णावती के नेतृत्व में बहादुर शाह के आक्रमण के समय फिर से जौहर हुआ और मेवाड़ के वीरों ने अंतिम सांस तक युद्ध किया।

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