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सदा प्रसन्न वीरेन्द्र भटनागर
कुछ लोग हर परिस्थिति में प्रसन्न रहकर सबको प्रसन्न रखते हैं। श्री वीरेन्द्र भटनागर ऐसे ही एक प्रचारक थे। उनके पिता श्री ज्ञानेन्द्र स्वरूप भटनागर लखनऊ के मुख्य डाकपाल कार्यालय में काम करते थे। किसी विवाह कार्यक्रम में वे परिवार सहित मथुरा आये थे। वहीं 15 जून, 1930 को वीरेन्द्र जी का जन्म हुआ। इसलिए इनकी दादी प्यार से इन्हें ‘मथुरावासी’ कहती थीं।
वीरेन्द्र जी बालपन में ही शाखा जाने लगे थे। 1947 में काशी से प्रथम वर्ष संघ शिक्षा वर्ग करते हुए उन्होंने प्रचारक बनने का निर्णय ले लिया। 1948 में संघ पर प्रतिबन्ध लग गया। इसके विरुद्ध वे लखनऊ जेल में रहे। जेल से आने के बाद उन्हें उ.प्र. में सीतापुर जिले के खैराबाद में भेजा गया। वहां किसी समय उनके दादा जी स्थानीय तालुकेदार के मुंशी रह चुके थे। अतः उनके भोजन, आवास आदि का प्रबन्ध हो गया। प्रतिबन्ध के कारण उन दिनों शाखा लगाना मना था। अतः वे लोगों से सम्पर्क कर उन्हें संघ के बारे में जानकारी देते रहे। इसी बीच उन्होंने इंटर की परीक्षा भी उत्तीर्ण कर ली।

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