75 साल पहले पाकिस्तान ने कबाइलियों की आड़ में 22 अक्तूबर 1947 को ऑपरेशन गुलमर्ग के तहत कश्मीर कब्जाने के लिए हमला बोल दिया था। जब कश्मीर के महाराजा हरि सिंह ने जब मुजफ्फराबाद पर पाकिस्तानी सेना द्वारा कब्जे की खबर सुनी, तो उन्होंने खुद दुश्मनों से मोर्चा लेने का फैसला किया।
महाराजा हरि सिंह ने सैन्य वर्दी पहनकर ब्रिगेडियर राजेंद्र सिंह को बुलाया। ब्रिगेडियर सिंह जब महाराजा हरि सिंह के पास पहुंचे तो उन्होंने महाराजा को मोर्चे से दूर रहने के लिए मनाते हुए खुद दुश्मन का आगे जाकर मुकाबला करने का निर्णय लिया। साथ ही महाराजा को सुझाव दिया कि वह श्रीनगर में रह कर भारत के साथ विलय पर अपनी बातचीत को तेज करें। महाराजा ने भारत के गृहमंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल से फोन पर बातचीत कर राज्य के हालात को बताया लेकिन भारत ने एक बार फिर विलय को लेकर अपनी बात दोहराई, लिहाजा महाराजा हरि सिंह ने भारत के साथ विलय होने में अपनी मंजूरी दे दी।
वही ब्रिगेडियर राजेंद्र सिंह ने 100 सैनिकों की टुकड़ी के साथ 6 हज़ार से अधिक दुश्मनों को रोकने के लिए उड़ी में मोर्चा संभाला। पांच दिन तक दुश्मन को रोकने वाले ब्रिगेडियर राजेंद्र सिंह 26 अक्तूबर को अपने साथियों को साथ वीरगति प्राप्त हो गए।
मैं अंतिम सांस और अंतिम जवान तक लडूंगा।”
ये सिर्फ शब्द नहीं थे, बल्कि भारत माता के सच्चे सपूत ब्रिगेडियर राजेन्द्र सिंह की संकल्पगाथा थी, जिसने न केवल जम्मू-कश्मीर को बचाया, बल्कि भारत के एकीकरण में निर्णायक भूमिका निभाई।
ब्रिगेडियर राजेंद्र सिंह के नेतृत्व में, 150 सैनिकों ने लगभग 6,000 से अधिक पाकिस्तानी हमलावरों को रोका, जिसने भारत के इतिहास को बदल दिया। ब्रिगेडियर राजेंद्र सिंह की कहानी देशभक्ति की प्रसिद्द मिसाल है। 150 सैनिकों के साथ 6,000 हमलावरों को रोककर उन्होंने इतिहास बना दिया। उनके बलिदान ने कश्मीर को बचाया और डोगरा समुदाय के लिए गर्व का प्रतीक बनाया। उनकी वीर गाथा आज भी जम्मू-कश्मीर में प्रेरणा देती है, जहां लोग उनकी तरह देश की रक्षा में समर्पित हैं।