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दुनिया में माँ-बाप से बड़ा कोई भगवान नहीं होता भाई, क्योंकि जब पूरी दुनिया आपके सपनों पर हँसकर आपको 'पागल' कह रही होती है, तब सिर्फ़ एक माँ होती है जो अपनी सबसे पवित्र पूंजी भी आपके कदमों में न्योछावर कर देती है! 🥹🏹❤️
तुर्की के अंताल्या में आयोजित तीरंदाजी विश्व कप (Stage 3) से भारत के लिए एक ऐसी ऐतिहासिक और भावुक कर देने वाली खबर आई है, जिसे हर हिंदुस्तानी को पढ़ना चाहिए। हमारे 24 साल के जांबाज तीरंदाज धीरज बोम्मादेवेरा ने मैदान पर वो तहलका मचाया कि बड़े-बड़े देश देखते रह गए। उन्होंने पहले मिक्स्ड टीम में और फिर इंडिविजुअल मुकाबले में दुनिया के सबसे खतरनाक माने जाने वाले साउथ कोरियन तीरंदाजों को धूल चटाकर 2 गोल्ड मेडल अपने नाम किए।
लेकिन इस सुनहरी जीत की कहानी आज से 10 साल पहले एक बेहद भावुक मोड़ से शुरू हुई थी:
माँ का वो सर्वोच्च त्याग: एक वक्त था जब धीरज के परिवार की आर्थिक स्थिति इतनी खराब थी कि वे तीरंदाजी का महँगा सामान (Equipment) नहीं खरीद सकते थे। धीरज खेल छोड़ने वाले थे, लेकिन उनकी माँ रेवती जी ने हार नहीं मानी। उन्होंने अपने गले का 'मंगलसूत्र' और गहने बेचकर ₹56,000 जुटाए ताकि बेटे के लिए एक पुराना (Second-hand) धनुष खरीदा जा सके।
बाप का अटूट साथ: पिता श्रवण कुमार ने बेटे की खातिर खुद तीरंदाजी के नियम सीखे और नेशनल जज बने ताकि वे हर कदम पर अपने बेटे का मार्गदर्शन कर सकें और उसके साथ जा सकें।
माँ के आंसुओं का जवाब: जब धीरज ने गोल्ड जीता तो उनकी माँ ने रोते हुए कहा—"आज मेरे बेटे ने जो मेडल जीते हैं, उनकी कीमत हमारे बेचे हुए गहनों से करोड़ों गुना बढ़कर है।"
रिश्तेदारों और समाज ने इस परिवार को ताने दिए, उन्हें पागल कहा, लेकिन धीरज के माता-पिता के उस 'पागलपन' और अटूट भरोसे ने आज देश को एक विश्व विजेता दे दिया। आज जब यह जांबाज सेना के आर्मी स्पोर्ट्स इंस्टीट्यूट के दम पर देश का नाम रौशन कर रहा है, तो इन दो गोल्ड मेडल पर जितना हक धीरज का है, उससे कहीं ज्यादा हक उनकी माँ के उस त्यागे हुए मंगलसूत्र का है।

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