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पिछले कुछ सालों में आत्मसमर्पण करने वाले नक्सलियों के पुनर्वास पर सरकार लाखों रुपये खर्च कर रही है। उन्हें आर्थिक सहायता, घर, स्किल ट्रेनिंग और महीनों तक स्टाइपेंड दिया जाता है, ताकि वे मुख्यधारा में लौट सकें।

लेकिन सवाल यह है कि अगर एक युवक बिना किसी पुराने आपराधिक रिकॉर्ड के आत्मसमर्पण कर रहा हो, तो क्या उसे भी कानून के तहत निष्पक्ष सुनवाई और जीने का मौका नहीं मिलना चाहिए?

मेरी नज़र में भरत तिवारी मामले में निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। कानून का काम अपराध की सजा तय करना है, बिना न्यायिक प्रक्रिया के किसी की जान लेना नहीं। अगर समाज के लिए आवाज़ उठाने वाला युवा भी अपनी बात रखने से डरे, तो यह लोकतंत्र के लिए चिंता का विषय है।

यह मेरी व्यक्तिगत राय है। सच्चाई का फैसला निष्पक्ष जांच और न्यायालय के माध्यम से ही होना चाहिए।

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